जलवायु परिवर्तन 

प्रदीर्घ बदलाओं से गुजरती हमारी धरती आज ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ हमें व्यापक तौर पर कदम उठाने की जरूरत है।

सर्दियों के मौसम में गर्मी का होना, वर्षा में अनियमितता, मौसम के हिसाब से रहनेवाले तापमान में बढ़ोतरी, सुखा या अकाल जैसी स्थिति यही जलवायु परिवर्तन का बढ़ता खतरा है।

औद्योगिक विकास के कारण मानवीय जीवन को पुर्णतः बदल दिया है, लेकिन औद्योगिक विकास से जुड़ें खतरों को हमने नजरंदाज किया है और इन सब वजहों से जलवायु में बदलाव आ रहा है।

जंगल की कटाई, औद्योगिक विकास से होनेवाला प्रदुषण, जीवाश्म इंधन और अन्य स्त्रोतों का अधिक इस्तेमाल आदि जलवायु परिवर्तन के मुख्य कारण है।

जलवायु परिवर्तन के फलस्वरूप ध्रुवीय बर्फ के पिघलने के कारण विश्व का औसत समुद्री जलस्तर इक्कीसवीं शताब्दी के अन्त तक 9 से 88 सेमी. तक बढ़ने की सम्भावना है

जलवायु में उष्णता के कारण उष्ण कटिबन्धीय वनों में आग लगने की घटनाओं में वृद्धि होगी परिणामस्वरूप वनों के विनाश के कारण जैवविविधता का ह्रास होगा।

जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को देखते हुए समय की सबसे बड़ी आवश्यकता यह है कि ग्रीन हाउस प्रभाव के लिये उत्तरदायी गैसों के उत्सर्जन पर रोक लगाई जाये।

साथ ही जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने के लिए सभी देशों को मिलकर उपायों में निवेश करने, ग्रीन जॉब, हरित अर्थव्यवस्था के निर्माण की ओर आगे बढ़ने की जरूरत है।

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